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Bigg Boss 12: बिग बॉस सीजन 12 का पहला प्रोमो रिलीज़ हुआ. देखे!

इंडिया का सबसे बड़ा TV रियलिटी शो बिग बॉस का बारहवां सीजन जल्द आने वाला हैं. लेकिन उस से पहले बिग बॉस सीजन 12 का प्रोमो आज रिलीज़ हो गया हैं. अनुमानित है की ‘बिग बॉस’ का 12वां सीजन, Bigg Boss 12 सितंबर में 12 से शुरू होगा.

‘बिग बॉस 12′ के मेकर्स ने शो का पहला प्रोमो रिलीज किया है, जिसमें सलमान खान सीजन 12 के फॉर्मेट को समझाते नजर आ रहे हैं. वीडियो में सलमान खान एक टीचर के अंदाज में सूट-बूट पहने क्लास रूम में धासू एंट्री मारते हैं.

Bigg Boss 12 के प्रोमो में सलमान खान कहते हैं कि इस साल शो की ABCD सबकुछ बदल जाएगा. इसमें रैपर से लेकर जुड़वां बहने, सास-बहू से लेकर छोटे-बड़े सब लोग होंगे. वीडियो के आखिर में सलमान मस्ती भरे अंदाज में दिख रहे हैं.

बता दें, बिग बॉस’ का सीजन-11 के विनर शिल्पा शिंदे अपने पिछले जिंदगी में कंट्रोवर्सी के चलते हमसे चर्चा में रहे. उसी के ध्यान में रखते हुआ मेकर्स ने शो के लिए जोड़ियों की तलाश शुरू कर दी है.

खबरें गर्म हैं कि ‘बिग बॉस-12’ के ऑडिशन भी शुरू हो चुके हैं. पिछले सीजन की तरह इस बार भी शो में सेलिब्रेटी और आम आदमी (कॉमनर) का कॉम्बिनेशन देखने को मिलेगा. कहा जा रहा है इस सीजन एक पोर्न स्टार की एंट्री होगी, साथ ही मिलिंद सोमन भी इसमें नजर आ सकते हैं.

आप भी बिग बॉस सीजन 12 के पहला प्रोमो देख सकते है.

‘बिग बॉस सीजन-12’ में इस बार हमें जोड़ियों देखने को मिलेगी. यह पति-पत्नी, गर्लफ्रेंड-बॉयफ्रेंड, मां-बेटा, बाप-बेटी या भाई-बहन से जुड़ी हो सकती है. कुल मिलाकर 12 कंटेस्टेंट शो में हिस्सा लेंगे. रिपोर्ट्स की मानें तो 6 सेलेब्स और 6 कॉमनर शो से जुड़ेंगे.

राखी और मूर्तियों पर नहीं लागू होगा GST, सरकार ने बताया विरासत का हिस्सा

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सरकार ने आज एक अहम् फैसला लेते हुआ कहा की राखी और मूर्तियों पर नहीं लागू होगा GST. रक्षाबंधन और गणेश चतुर्थी जैसे त्योहार भारत में धूम धाम से मनाया जाता हैं. ऐसे में सरकार का ये फैसला लोगो के लिए बड़ी राहत हैं.

केंद्रीय वित्त मंत्री पीयूष गोयल ने कहा कि रक्षाबंधन आ रहा है, हमने राखी पर से जीएसटी की छूट दी है. इसके अलावा सरकार ने गणेश चतुर्थी से पहले सभी प्रकार की मूर्तियों, हस्तशिल्प, हथकरघा को भी जीएसटी से अलग रखा है.

पीयूष गोयल ने कहा कि ये सभी चीजें हमारी विरासत हैं और हमें सम्मान के साथ इन्हें रखना है. सरकार का ये कदम इस वजह से भी खास है क्योंकि गणेश चतुर्थी और रक्षाबंधन पर लोग काफी खरीददारी करते हैं. इसलिए त्योहारी मौसम में इनसे जुड़ी चीजों पर से जीएसटी की छूट मिलना बहुत बड़ी राहत है. सरकार के इस कदम से राखी की खरीदारी के लिए लोगों के पॉकेट पर ज्यादा बोझ नहीं पड़ेगा

आपको बता दें कि रक्षाबंधन इस साल 26 अगस्त को है तो वहीं गणेश चतुर्थी 13 सितंबर को है. बता दें कि बहनें अपनी भाइयों की कलाई में राखी बांधने के लिए जमकर तैयारियां कर रही हैं. बाजार भी इन दिनों अलग-अलग तरह की राखियों से पटे पड़े हैं.

सरकार पहले भी इस तरह के ऑफर लेकर आयी हैं. अब देखना ये हैं की इसका सीधा असर लोगो पे कितना पड़ता हैं.

इससे पहले सरकार ने सैनेटरी नैपकिन को जीएसटी फ्री कर महिलाओं को बड़ी राहत दी थी. पहले इस प्रोडक्‍ट पर 12 फीसदी का जीएसटी लगता था. महिलाओं के लिए ज्‍वैलरी, हेयर ड्रायर, परफ्यूम और हैंड बैग को लेकर भी सरकार ने राहत दी थी. ये प्रोडक्‍ट पहले 28 फीसदी के जीएसटी स्‍लैब में थे जो अब 18 फीसदी के जीएसटी स्‍लैब में हैं.

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एक और पूल गिरा, चार लोग जख्मी

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देश में इमारत और ब्रिज गिरने का सिलसिला लगातार जारी हैं. चाहे वो बारिश कारन हो या फिर कोई और. शनिवार सुबह 7.30 बजे उत्तर प्रदेश के बस्ती में नेशनल हाईवे 28 पर निर्माणाधीन फ्लाईओवर अचानक ढह गया. फ्लाईओवर का 60 फीसदी से अधिक काम पूरा हो चुका था.

पुल के गिरने से पांच लोग गंभीर रूप से जख्मी हो गए हैं. एक शख्स अभी भी मलबे में दबा हुआ है. मलबे में दबे लोगों को निकालने के लिए रेस्क्यू ऑपरेशन अब भी जारी है. इलाके में यातायात ठप हो गया है.

घायलों को तुरंत नजदीकी अस्पताल पहुंचाया गया. इसमें किसी को भी मरने की खबर नहीं हैं.

जानकारी के मुताबिक एनएचएआई के द्वारा इस पुल का निर्माण करोड़ों की लागत से हो रहा था. लेकिन इसके तैयार होने से पहले ही एनएचएआई की लापरवाही सामने आ गई.

मौके पर प्रशासन की टीम ने पहुंचकर जांच शुरू कर दी है. वहीं मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने स्थानीय प्रशासन को तुरंत राहत पहुंचाने का आदेश जारी किया है ताकि इलाके में यातायात फिर से शुरू हो सके.

ये एक गंभीर मुद्दा हैं. करोड़ो की लागत से बनाने वाला पुल युही गिर जाता हैं.

सिलिगुड़ी में भी गिरा पुल

पश्चिम बंगाल स्थित सिलिगुड़ी के गोलतुली इलाके में शनिवार सुबह पुल गिर गया. यहां एनएच- 31डी रेलवे फ्लाईओवर का एक हिस्सा गिर गया. हालांकि इस हादसे में किसी के हताहत होने की कोई खबर नहीं है.

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BJP के दो पूर्व मंत्रियों ने माना- राफेल विमान सौदा आजाद भारत का सबसे बड़ा ‘घोटाला’ है

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रफले डील का मामला थमने का नाम नहीं ले रहा हैं. NDTV के सीनियर एग्जीक्यूटिव एडिटर रविश कुमार के बाद अब बीजेपी के ही दो पूर्व मंत्री इसका खुल के विरोध कर रहे हैं.

राफेल डील पर कल बीजेपी दो पूर्व दिग्गज नेता यशवंत सिन्हा और अरुण शौरी ने दिल्ली में प्रेस कांफ्रेंस की। इस दौरान यशवंत सिन्हा मोदी सरकार पर काफी हमलावर रहे।

अटल सरकार में वित्त मंत्री रहे यशवंत सिन्हा ने खुद को सौभाग्यशाली बताते हुए कहा, हास्यास्पद है कि आज तक रिज़र्व बैंक नोटबन्दी के दौरान जमा हुए नोट आज तक नहीं गिन पाया। मुझे गर्व है कि मैं वर्तमान सरकार और भाजपा का हिस्सा नहीं हूँ।

यशवंत सिन्हा ने नोटबंदी से लेकर सरकार के मंत्रालयों पर सवाल उठाते हुए कहा कि रक्षा मंत्री को राफेल डील के बारे में पता नहीं होता और वित्त मंत्री को नोटबंदी के बारे में पता नहीं होता। सिन्हा ने कहा कि ऐसी कैसी कैबिनेट चल रही है देश में जहां किसी को कुछ पता ही नहीं है।

बता दें कि इससे पहले यशवंत सिन्हा ने बीजेपी ने छोड़ राजनैतिक जीवन को अलविदा कह दिया था। वहीँ वो मोदी सरकार की हर कदम पर आलोचना करते हुए आये है। इससे पहले उन्होंने नोटबंदी के ठीक बाद जीएसटी लागू करने पर मोदी सरकार को जमकर कोसा था।

कुमारस्वामी के शपथग्रहण पर खर्च ₹42 लाख पर देवेंद्र फडणवीस के शपथग्रहण पर खर्च हुए थे ₹98 लाख

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कर्नाटक के मुख्यमंत्री एचडी कुमारस्वामी के शपथ ग्रहण समारोह पर कर्नाटक सरकार ने 42 लाख रुपए खर्च किए। 42 लाख ये बहुत बड़ी रकम है. बीजेपी पेड मीडिया प्राइम टाइम पे ये शो चला रहे हैं. लेकिन क्या आपको मालूम है, की बीजेपी सरकार ने कितना लाख रुपए खर्च किये है जो.

आमतः ये रिपोर्ट कोई भी सरकार खुद जनता को नहीं बताती फिर भी अगर आपको जानना है तो आपको एक RTI (Right To Information) डालना पड़ेगा जिसके द्वारा ये सारी जानकारी प्राप्त कर सकते है.

हाल ही में हुआ कर्नाटक के मुख्यमंत्री एचडी कुमारस्वामी के शपथ ग्रहण समारोह पर कर्नाटक सरकार ने 42 लाख रुपए खर्च किए।

ये खर्च इन नेताओं पर हुआ

नेता खर्च (रुपए में)
मायावती (बसपा) 1,41,443
अखिलेश यादव (सपा) 1,02,400
पिनाराई विजयन (सीपीआई-एम) 1,02,400
अशोक गहलोत (कांग्रेस) 1,02,400
सीताराम येचुरी (सीपीआई-एम) 64,000
बाबूलाल मरांडी (जेवीएम-पी) 45,952
हेमंत सोरेन (झामुमो) 38,400
असदुद्दीन ओवैसी (एआईएमआईएम) 38,400

ये खबर देख कर अगर आप चौक गए हैं तो आगे और भी चौकाने वाला खबर हैं.

ये कहानी सिर्फ कर्नाटका का ही नहीं हैं. बीजेपी साशित राज्य महाराष्ट्र में भी देवेंद्र फडणवीस के शपथग्रहण पर खर्च हुए थे ₹98 लाख रुपये।

ये रकम भी टैक्स पेयर के पैसे से ही चुकाया गया था.

The government of Karnataka’s State Hospitality Organisation ने 13 मई, 2013 को सिद्धाराय्याह के शपथ ग्रहण समारोह और 17 मई, 2018 को बीएस येदियुरप्पा के मेहमानों के आवास प्रदान करने के लिए कोई पैसा नहीं लगाया।

आप अपना सुझाव जरूर बताये.

राफेल लड़ाकू विमान से जुड़े सवाल-जवाब रविश कुमार के द्वारा

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सबसे पहले दो तीन तारीखों को लेकर स्पष्ट हो जाइये। 10 अप्रैल 2015 को प्रधानमंत्री मोदी और फ्रांस के राष्ट्रपति ओलांद रफाल डील का एलान करते हैं।

इसके 16 दिन पहले यानी 25 मार्च 2015 को राफेल विमान बनाने वाली कंपनी डास्सो एविएशन के सीईओ मीडिया से बात करते हुए हिन्दुस्तान एयरोनोटिक्स लिमिटेड के चेयरमैन का ज़िक्र करते हैं। कहते हैं कि “एचएएल चेयरमैन से सुनकर आप सुनकर मेरे संतोष की कल्पना कर सकते हैं कि हमने ज़िम्मेदारियों के साझा करने से सहमत हैं. हम रिक्वेस्ट फ़ॉर प्रपोजल( ROP) तय की गई प्रक्रिया को लेकर प्रतिबद्द हैं. मुझे पूरा भरोसा है कि कांट्रेक्ट को पूरा करने और और उस पर हस्ताक्षर करने का काम जल्दी हो जाएगा।”

आपने ठीक से पढ़ा न। बातचीत की सारी प्रक्रिया यूपीए के समय जारी रिक्वेस्ट ऑफ प्रपोजल के हिसाब से चल रही है। यानी नया कुछ नहीं हुआ है। यह वो समय है जब प्रधानमंत्री की यात्रा को लेकर तैयारियां चल रही हैं। माहौल बनाया जा रहा है। 16 दिन बाद प्रधानमंत्री मोदी फ्रांस के लिए रवाना होते हैं। यानी अब तक इस डील की प्रक्रिया में हिन्दुस्तान एयरोनोटिक्स लिमिटेड कंपनी शामिल है, तभी तो रफाल कंपनी के चेयरमैन उनका नाम लेते हैं। हिन्दुस्तान एयरोनोटिक्स सार्वजनिक क्षेत्र की यानी सरकारी कंपनी है। इसका इस क्षेत्र में कई दशकों का अनुभव है।

यात्रा के दिन करीब आते जा रहे हैं। दो दिन पहले 8 अप्रैल 2015 को तब के विदेश सचिव एस जयशंकर प्रेस से बात करते हुए कहते हैं कि “राफेल को लेकर मेरी समझ यह है कि फ्रेंच कंपनी, हमारा रक्षा मंत्रालय और हिन्दुस्तान एयरोनोटिक्स लिमिटेड के बीच चर्चा चल रही है. ये सभी टेक्निकल और डिटेल चर्चा है. नेतृत्व के स्तर पर जो यात्रा होती है उसमें हम रक्षा सौदों को लेकर शामिल नहीं करते हैं. वो अलग ही ट्रैक पर चल रहा होता है।”

अभी तक आपने देखा कि 25 मार्च से लेकर 8 अप्रैल 2015 तक विदेश सचिव और राफेल बनाने वाली कंपनी डास्सो एविएशन के सीईओ हिन्दुस्तान एयरोनोटिक्स लिमिटेड का नाम ले रहे हैं यानी पता चल रहा है कि यह कंपनी इस डील का पार्ट है। डील का काम इसे ही मिलना है।

अब यहां पर एक और तथ्य है जिस पर अपनी नज़र बनाए रखिए। मार्च 2014 में हिन्दुस्तान एविएशन लिमिटेड और डास्सो एविशेन के बीच एक करार हो चुका होता है कि 108 लड़ाकू विमान भारत में ही बनाए जाएंगे इसलिए उसे लाइसेंस और टेक्नालजी मिलेगी। 70 फीसदी काम हिन्दुस्तान एयरोनोटिक्स लिमिटेड का होगा, बाकी 30 फीसदी डास्सो करेगी।

10 अप्रैल को जब प्रधानमंत्री मोदी डील का एलान करते हैं तब इस सरकारी कंपनी का नाम कट जाता है। वो पूरी प्रक्रिया से ग़ायब हो जाती है और एक नई कंपनी वजूद में आ जाती है, जिसके अनुभव पर सवाल है, जिसके कुछ ही दिन पहले बनाये जाने की बात उठी है, उसे काम मिल जाता है। प्रशांत भूषण, यशंवत सिन्हा और अरुण शौरी ने अपनी प्रेस कांफ्रेंस में यह आरोप लगाए हैं। उन्हीं की प्रेस रीलीज़ से मैंने ये घटनाओं का सिलसिला आपके लिए अपने हिसाब से पेश किया है।

अब इस जगह आप ठहर जाइये। चलिए चलते हैं वहां जहां राफेल विमान की बात शुरू होती है। 2007 में भारतीय वायुसेना ने सरकार को अपनी ज़रूरत बताई थी और उस आधार पर यूपीए सरकार ने रिक्वेस्ट ऑफ प्रपोज़ल (ROP) तैयार किया था कि वह 167 मीडियम मल्टी रोल कंबैट (MMRC) एयरक्राफ्ट खरीदेगा। इसके लिए जो टेंडर जारी होगा उसमें यह सब भी होगा कि शुरुआती ख़रीद की लागत क्या होगी, विमान कंपनी भारत को टेक्नॉलजी देगी और भारत में उत्पादन के लाइसेंस देगी।

टेंडर जारी होता है और लड़ाकू विमान बनाने वाली 6 कंपनियां उसमें हिससा लेती हैं। सभी विमानों के परीक्षण और कंपनियों से बातचीत के बाद भारत की वायु सेना 2011 में अपनी पंसद बताती है कि दो कंपनियों के विमान उसकी ज़रूरत के नज़दीक हैं। एक डास्सा एविएशन का राफेल और दूसरा यूरोफाइटर्स का विमान। 2012 के टेंडर में डास्सो ने सबसे कम रेट दिया था। इसके आधार पर भारत सरकार और डास्सो कंपनी के बीच बातचीत शुरू होती है।

अब सवाल है कि क्या प्रधानमंत्री मोदी ने जो डील की है वो पहले से चली आ रही प्रक्रिया और उसकी शर्तों के मुताबिक थी या फिर उसमें बदलाव किया गया? क्यों बदलाव हुआ? क्या भारतीय वायुसेना ने कोई नया प्रस्ताव दिया था, क्या डास्सो कंपनी ने नए दरों यानी कम दरों पर सप्लाई का कोई नया प्रस्ताव दिया था?

क्योंकि 10 अप्रैल 2015 के साझा बयान में जिस डील का ज़िक्र है वो 2012 से 8 अप्रैल 2015 तक चली आ रही प्रक्रिया और शर्तों से बिल्कुल अलग थी। 8 अप्रैल की बात इसलिए कही क्योंकि इसीदिन विदेश सचिव एस जयशंकर कह रहे हैं कि बातचीत पुरानी प्रक्रिया का हिस्सा है और उसमें हिन्दुसतान एयरोनोटिक्स लिमिटेड शामिल है। जबकि यह कंपनी दो दिन बाद इस डील से बाहर हो जाती है। एच ए एल को डील से बाहर करने का फैसला कब हुआ, किस स्तर पर हुआ, कौन कौन शामिल था, क्या वायु सेना की कोई राय ली गई थी?

अब यहां पर प्रशांत भूषण, अरुण शौरी और यशवंत सिन्हा आरोप लगाते हैं कि 60 साल की अनुभवी कंपनी हिन्दुस्तान एयरोनोटिक्स( HAL) को सौदे से बाहर कर दिया जाता है और एक ऐसी कंपनी अचानक इस सौदे में प्रवेश करती है जिसका कहीं ज़िक्र नहीं था। होता तो विदेश सचिव एस जयशंकर HAL की जगह रिलायंस डिफेंस लिमिटेड का नाम लेते। 25 मार्च को डास्सो एविएशन के सी ई ओ HAL की जगह रिलायंस डिफेंस का नाम लेते।

प्रशांत भूषण का कहना है कि रिलायंस डिफेंस पर भारतीय बैंकों का 8000 करोड़ का कर्ज़ा बाकी है। कंपनी घाटे में चल रही है। अनुभव भी नहीं है क्योंकि इनकी कंपनी भारतीय नौ सेना को एक जहाज़ बनाकर देने का वादा पूरा नहीं कर पाई। फिर अनिल अंबानी की इस कंपनी पर ये मेहरबानी क्यों की गई? फ्री में ?

अनिल अंबानी की कंपनी ने इस सवाल पर एक जवाब दिया है। उसे यहां बीच में ला रहा हूं। ” हमें अपने तथ्य सही कर लेने चाहिए. इस कॉन्ट्रैक्ट के तहत कोई लड़ाकू विमान नहीं बनाए जाने हैं क्योंकि सभी विमान फ्रांस से फ्लाई अवे कंडीशन में आने हैं. भारत में HAL को छोड़ किसी भी कंपनी को लड़ाकू विमान बनाने का अनुभव नहीं है. अगर इस तर्क के हिसाब से चलें तो इसका मतलब होगा कि हम जो अभी है उसके अलावा कभी कोई नई क्षमता नहीं बना पाएंगे. और रक्षा से जुड़े 70% हार्डवेयर को आयात करते रहेंगे”

ओह तो भारत सरकार ने एक नई कंपनी को प्रमोट करने के लिए अनुभवी कंपनी को सौदे से बाहर कर दिया? “रक्षा से जुड़े 70 फीसदी हार्डवेयर का आयात ही करते रहेंगे।” अनिल अंबानी को बताना चाहिए कि वो कौन कौन से हार्डवेयर बना रहे हैं जिसके कारण भारत को आयान नहीं करना पड़ेगा। क्या उन्हें नहीं पता कि इस डील के तहत ट्रांसफर ऑफ टेक्नालजी नहीं हुई है। यानी डास्सो ने अपनी तकनीक भारतीय कंपनी से साझा करने का कोई वादा नहीं किया है। इस पर भी प्रशांत भूषण ने सवाल उठाए हैं कि यूपीए के समय ट्रांसफर ऑफ टेक्नालजी देने की बात हुई थी, वो बात क्यों ग़ायब हो गई। बहरहाल अनिल अंबानी की कंपनी स्वीकार कर लेती है कि वह नई है। अनुभव नहीं है। आप फिर से ऊपर के पैराग्राफ जाकर पढ़ सकते हैं।

भारत सरकार की बातें निराली हैं। जब यह मामला राहुल गांधी ने उठाया तो रक्षा मंत्री निर्मला सीतारमण ने कहा कि देश के सामने सब रख देंगे। मगर बाद में मुकर गईं। कहने लगीं कि फ्रांस से गुप्तता का क़रार हुआ है।

जबकि 13 अप्रैल 2015 को दूरदर्शन को इंटरव्यू देते हुए रक्षा मंत्री मनोहर पर्रिकर बता चुके थे कि 126 एयरक्राफ्ट की कीमत 90,000 करोड़ होगी.

एक रक्षा मंत्री कह रहे हैं कि 90,000 करोड़ की डील हैं और एक रक्षा मंत्री कह रही हैं कि कितने की डील है, हम नहीं बताएंगे।

यही नहीं दो मौके पर संसद में रक्षा राज्य मंत्री दाम के बारे में बता चुके थे तो फिर दाम बताने में क्या हर्ज है। आरोप है कि जब टेक्नालजी नहीं दे रहा है तब फिर इस विमान का दाम प्रति विमान 1000 करोड़ ज़्यादा कैसे हो गया? यूपीए के समय वही विमान 700 करोड़ में आ रहा था, अब आरोप है कि एक विमान के 1600-1700 करोड़ दिए जा रहे हैं। किसके फायदे के लिए?

अजय शुक्ला ने भी लिखा है कि डील के बाद प्रेस से एक अनौपचारिक ब्रीफिंग में सबको दाम बताए गए थे। उन् लोगों ने रिपोर्ट भी की थी। इसी फेसबुक पेज @RavishKaPage पर मैंने अजय शुक्ला की रिपोर्ट का हिन्दी अनुवाद किया है।

इस साल फ्रांस के राष्ट्रपति मैंक्रां भारत आए थे। उन्होंने इंडिया टुडे चैनल से कहा था कि भारत सरकार चाहे तो विपक्ष को भरोसे में लेने के लिए कुछ बातें बता सकती हैं। उन्हें ऐतराज़ नहीं है। आप ख़ुद भी इंटरनेट पर इस इंटरव्यू को सर्च कर सकते हैं।

अब यहां पर आप फिर से 25 मार्च 2015, 8 अप्रैल 2015 और 10 अप्रैल 2015 की तारीखों को याद कीजिए। प्रशांत भूषण का आरोप है कि 28 मार्च 2015 को अदानी डिफेंस सिस्टम एंड टेक्नॉलजी लिमिटेड और 28 मार्च को रिलायंस डिफेंस लिमिटेड कंपनी को इस प्रक्रिया में शामिल कर लिया जाता है। जो खेल 28 मार्च को हो गया था उसके बारे में भारत के विदेश सचिव को पता ही नहीं है। वो तो HAL का नाम ले रहे थे। यानी उन्हें कुछ पता नहीं था कि क्या होने जा रहा है।

प्रशांत भूषण इस स्तर पर एक नई बात कहते हैं। वे कहते हैं कि अगर किसी स्तर पर कोई नई कंपनी डील में शामिल होती है तो इसके लिए अलग से नियम बने हैं। 2005 में बने इस नियमावली को आफसेट नियमावली कहते हैं। इस नियम के अनुसार उस कंपनी का मूल्यांकन होगा और रक्षा मंत्री साइन करेंगे। तो क्या रक्षा मंत्री मनोहर पर्रिकर ने किसी फाइल पर साइन किया था, क्या उन्हें इस बारे में पता था? साथ ही रक्षा मामलों की कैबिनेट कमीटी में क्या इस पर चर्चा हुई थी?

एक प्रश्न और उठाया है। 4 जुलाई 2014 को यूरोफाइटर्स रक्षा मंत्री अरुण जेटली को पत्र लिखती है कि वह अपनी लागत में 20 प्रतिशत की कटौती के लिए तैयार है। याद कीजिए कि 2011 में भारतीय वायु सेना ने दो कंपनियों को अपने हिसाब का बताया था। एक डास्सो और दूसरी यूरोफाइटर्स। प्रशांत भूषण, अरुण शौरी और यशवंत सिन्हा का आरोप है कि जब यह कंपनी सस्ते में विमान दे रही थी तब नया टेंडर क्यों नहीं निकाला गया?

यूपीए के समय 18 विमान उड़ान के लिए तैयार अवस्था में देने की बात हो रही थी, अब 36 विमानों की बात होने लगी। क्या इसके लिए भारतीय वायु सेना अपनी तरफ से कुछ कहा था कि हमें 18 नहीं 36 चाहिएं? और अगर इसे तुरंत हासिल किया जाना था तो आज उस डील के तीन साल से अधिक हो गए, एक भी राफेल विमान क्यों नहीं भारत पहुंचा है?

रिलायंस डिफेंस का कहना है कि उस पर ग़लत आरोप लगाए जा रहे हैं कि इस सौदे से 30,000 करोड़ का ठेका मिला है। कंपनी का कहना है कि रिलायंस डिफेंस या रिलायंस ग्रुप की किसी और कंपनी ने अभी तक 36 राफेल विमानों से जुड़ा कोई कॉन्ट्रैक्ट रक्षा मंत्रालय से हासिल नहीं किया है. ये बातें पूरी तरह निराधार हैं।

जवाब में इस बात पर ग़ौर करें, “कोई कांट्रेक्ट रक्षा मंत्रालय से हासिल नहीं किया गया है। ”

लेकिन अपने प्रेस रीलीज में रिलायंस डिफेंस कंपनी एक और आरोप के जवाब में कहती है कि “विदेशी वेंडरस के भारतीय पार्टनर्स के चयन में रक्षा मंत्रालय की कोई भूमिका नहीं है. 2005 से अभी तक 50 ऑफसेट कांट्रेक्ट साइन हो चुके हैं, सब में एक ही प्रक्रिया अपनाई गई है. रिलायंस डिफेंस ने इसके जवाब में कहा है कि इस सवाल का जवाब रक्षा मंत्रालय ही सबसे सही दे सकता है।”

प्रशांत भूषण कहते हैं कि आफसेट कंपनी के लिए अलग से रूल है। आप समझ गए होंगे कि यहां रिलायंस डिफेंस कंपनी इसी आफसेट कंपनी के दायरे में आती है। प्रशांत कह रहे हैं कि ऐसी कंपनी के मामले में रक्षा मंत्री साइन करेंगे। अनिल अंबानी की कंपनी कहती है कि रक्षा मंत्रालय की कोई भूमिका नहीं होती है कि विदेशी वेंडर्स(विमान कंपनी) किस भारतीय कंपनी को अपना साझीदार चुनेगा?

क्या वाकई रक्षा मंत्रालय की इसमें कोई भूमिका नहीं है? मगर प्रशांत भूषण ने तो आफसेट नियमावली का पूरा आदेश पत्र दिया है। अनिल अंबानी को कैसे पता कि अभी तक 50 आफसेट कांट्रेक्ट साइन हो चुके हैं और सबमें एक ही प्रक्रिया अपनाई गई है? क्या रक्षा मंत्रालय के हिस्से का जवाब रक्षा मंत्रालय को नहीं देना चाहिए?

अब रिलायंस डिफेंस रक्षा मंत्रालय के बारे में एक और बात कहती है। ” ये समझना बेहतर होगा कि DPP-2016 के मुताबिक विदेशी वेंडर को इस चुनाव की सुविधा है कि वो ऑफ़सेट क्रेडिट्स के दावे के समय अपने ऑफसेट पार्टनर्स का ब्योरा दे सके। इस मामले में ऑफसेट obligations सितंबर 2019 के बाद ही ड्यू होंगी। इसलिए ये संभव है कि रक्षा मंत्रालय को Dassault से उसके ऑफ़सेट पार्टनर्स के बारे में कोई औपचारिक जानकारी ना मिली हो।

कमाल है। अनिल अंबानी को यह भी पता है कि रक्षा मंत्रालय में 50 आफसेट डील एक ही तरह से हुए हैं। यह भी पता है कि उनके डील के बारे में रक्षा मंत्रालय को पता ही न हो। वाह मोदी जी वाह ( ये अनायास निकल गया। माफी)

HAL के बाहर किए जाने पर रिलायंस डिफेंस की प्रेस रीलीज में जवाब है कि HAL 126 MMRCA प्रोग्राम के तहत नामांकित प्रोडक्शन एजेंसी थी जो कभी कॉन्ट्रैक्ट की स्टेज तक नहीं पहुंची।

लेकिन आपने शुरू में क्या पढ़ा, यही न कि 25 मार्च 2015 को डास्सो एविशन कंपनी के सीईओ HAL के चेयरमैन का शुक्रिया अदा कर रहे हैं और 8 अप्रैल 2015 को विदेश सचिव HAL के प्रक्रिया में बने रहने की बात कहते हैं। अगर यह कंपनी कांट्रेक्ट की स्टेज तक नहीं पहुंची तो डील के दो दिन पहले तक इसका नाम क्यों लिया जा रहा है।

सवाल तो यही है कि रिलायंस डिफेंस कैसे कांट्रेक्ट के स्टेज पर पहुंची, कब पहुंची, क्या उसने इसका जवाब दिया है, मुझे तो नहीं मिला मगर फिर भी एक बार और उनके प्रेस रीलीज़ को पढूंगा।

यह कैसी डील है कि अप्रैल 2015 से अगस्त 2018 आ गया अभी तक रक्षा मंत्रालय को जानकारी ही नहीं है, डास्सो एविएशन ने जानकारी ही नहीं दी है, और रिलायंस को सब पता है कि रक्षा मंत्रालय को क्या जानकारी है और क्या जानकारी नहीं है। वाह मोदी जी वाह( सॉरी फिर से निकल गया। )

आपने एक बात पर ग़ौर किया। सरकार कहती है कि इस डील से संबंधित कोई बात नहीं बता सकते। देश की सुरक्षा का सवाल है और गुप्तता का करार है। लेकिन यहां तो रिलायंस डिफेंस कंपनी चार पन्ने का प्रेस रीलीज़ दे रही है। तो क्या गुप्पतता का करार डील में हिस्सेदार कंपनी पर लागू नहीं है? सिर्फ मोदी जी की सरकार पर लागू है? वाह मोदी जी वाह( कान पकड़ता हूं, अब नहीं बोलूंगा, अनायस ही निकल गया)

अब तो रक्षा मंत्रालय को जवाब देना बनता है। रक्षा मंत्री नहीं बोल सकती तो कोई और मंत्री बोल दें। कोई ब्लाग लिख दे, कोई ट्विट कर दे। इस सरकार की यही तो खूबी है। कृषि पर फैसला होता है तो गृहमंत्री बोलते हैं और रक्षा मंत्रालय के बारे में कानून मंत्री बोलते हैं।

रिलायंस डिफेंस कहती है कि उसे 30,000 करोड़ का ठेका नहीं मिला है। डास्सो एविएशन किस ऑफसेट पार्टनर को कितना काम देगी, यह अभी तय नहीं हुआ है। डास्सो एविएशन ने इसके लिए 100 से अधिक भारतीय कंपनियों को इशारा किया है। इसमें से दो सरकारी कंपनियां हैं एचएएल और भारत इलेक्ट्रॉनिक्स लिमिटेड।

क्या डास्सो एविएशन ने आंख मार कर इशारा किया है या सीटी बजाई है। 100 कंपनियां पार्टरन बनने वाली हैं फिर भी रक्षा मंत्रालय को आफसेट पार्टरन के बारे में पता नहीं होगा? रिलायंस को पता है मगर रक्षा मंत्रालय को नहीं। दो सरकारी कंपनियां हैं, उनके बारे में सरकार को तो पता होगा।

आप सभी पाठकों से निवेदन हैं कि मैंने हिन्दी की सेवा के लिए इतनी मेहनत की है। हिन्दी के अख़बारों में ये सब होता नहीं है। आप इसे करोड़ों लोगों तक पहुंचा दें।

अगर यशंवत सिन्हा, प्रशांत भूषण और अरुण शौरी के प्रेस कांफ्रेंस के बाद सरकार जवाब देगी तो उसे भी विस्तार से पेश करूंगा। इनकी प्रेस रीलीज़ बहुत लंबी है, अंग्रेज़ी में है इसलिए सारी बातें यहां पेश नहीं की हैं और न ही रिलायस डिफेंस के जवाब की सारी बातें। आप दोनों ही इंटरनेट पर सर्च कर सकतें हैं।

(रवीश कुमार की फेसबुक वॉल से साभार)

साल का आखिरी सूर्य ग्रहण, जाने आपके जीवन पे इसका क्या होगा असर?

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भारत में हमेशा से खगोलीय घटनाओं का बड़ा स्थान रहा हैं. लोग इस घटना को जिन्दगी से जोड़ के देखते हैं. तो जाने साल 2018 का अंतिम सूर्य ग्रहण कब और कहाँ देखा जायेगा साथ में इस का आपके जीवन पे क्या असर पड़ेगा।

साल 2018 में तीन सूर्य ग्रहण पड़ने थे जिसमें से आखिरी आने वाली 11 अगस्त को शनिवार के दिन पड़ेगा। इससे पहले सूर्य ग्रहण 15 फरवरी और 13 जुलाई को पड़ चुका है। ये वर्ष का अंतिम ग्रहण होगा।

सूर्य ग्रहण भारत में देखा नहीं जायेगा

यह सूर्य ग्रहण भारत देश में देखा नहीं जायेगा। उत्तरी अमेरिका, उत्तर पश्चिमी एशिया, दक्षिण कोरिया, मास्को, चीन आैर लंदन आदि देशों के लोग इसे देख पाएंगे। इन देशों में सूर्यग्रहण सुबह 9 बजे से लेकर 9 बजकर 30 मिनट के बीच प्रारंभ होगा।

सूर्य ग्रहण सूतक काल भारत में रात 1 बजकर 32 मिनट पर शुरू

भारत में इस सूर्यग्रहण का सूतक काल 10 अगस्त की रात 1 बजकर 32 मिनट पर शुरू हो जाएगा और ग्रहण 11 अगस्‍त की शाम को 5 बजे समाप्‍त होगा।, परंतु क्योंकि ये भारत में नहीं दिखेगा, इसलिए यहां सूतक का प्रभाव ना के बराबर ही रहेगा।

पिछले साल के तरह इस साल भी ये सूर्य ग्रहण भारत में देखा नहीं जायेगा पर इसका प्रभाव कुछ राशियों पे अवश्य पड़ेगा। एेसे में जाने किस राशि पर क्या पड़ेगा सूर्य ग्रहण का असर। यह सूर्यग्रहण कर्क राशि में होने जा रहा है जो 4 राशियों मेष, मकर, तुला और कुंभ राशि के लिए शुभ फलदायी रहने वाला है।

राशियों पर प्रभाव

मेष राशि पर ग्रहण का व्यथा प्रदान करने वाला होगा, वृष राशि वालों को श्री यानि धन की प्राप्ति होगी, मिथंन राशि वालो को इसके विपरीत हानि हो सकती है, कर्क राशि वालों को क्षति होगी, सिंह राशि वालों को किसी भी रूप में घात का सामना करना पड़ सकता है, कन्या राशि वालों को लाभ होगा, तुला वालों को सुख देने वाला, वृश्चिक राशि वालों को मानभंग का सामना करना पड़ सकता है, धनु राशि वालों कष्ट उठाना पड़ सकता है, मकर राशि वालों को स्त्री संबंधि चिंता हो सकती है, कुंभ राशि वालों को सुख आैर मीन राशि वालों को चिंता का सामना करना पड़ सकता है।

अगले साल भी तीन ग्रहण

आने वाले साल 2019 में भी तीन ही सूर्य ग्रहण देखने को मिलेंगे। अगले साल का पहला सूर्य ग्रहण 6 जनवरी को, दूसरा 2 जुलाई को और तीसरा 26 अगस्त को पड़ेगा

मंजू वर्मा ने इस्तीफा दिया कहा मै कुशवाहा समाज से हूं इसलिए मुझे निशाना बनाया जा रहा है।

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बिहार के मुजफ्फरपुर शेल्टर होम में हुए महिलाओं के साथ यौन शोषण की घटना देश को हिला के रख दिया था. ऐसे में सबसे चौकाने वाली बात तो तब हुआ जब बिहार सोशल वेलफेयर मिनिस्टर (समाज कल्याण मंत्री) मंजू वर्मा के पति चंद्रशेखर वर्मा का नाम आ गया।

जिसके चलते विपक्ष लगातार मंजू वर्मा से इस्तीफे की मांग कर रहा था और नीतीश सरकार पर दबाव बना रहा था। फिर भी बीजेपी और बिहार के चीफमिनिस्टर नीतीश कुमार दोनों मंजू वर्मा को बचने की पूरी कोशिस में लगे हुए थे. आखिरकार विपक्ष के दबाब में बिहार सरकार की इकलौती महिला मंत्री को इस्तीफा देना पड़ा.

बिहार की समाज कल्याण मंत्री मंजू वर्मा ने सीएम नीतीश कुमार से मुलाकात के बाद उन्होंने इस्तीफा सौपा है। सीएम ने उनका इस्तीफा मंजूर किया है कि नही इसकी पुष्टि हालाकि अभी होना बाकी है वहीं निवर्तमान मंत्री ने अपने इस्तीफे के बाद जाति कार्ड खेला है उन्होने कहा है कि मै कुशवाहा समाज से हूं इसलिए मुझे निशाना बनाया जा रहा है।

इस केस की जांच कर रही सीबीआई ने ये खुलाशा किया था कि 34 नाबालिग बच्चियों के यौन उत्पीडऩ के मुख्य आरोपी ब्रजेश ठाकुर के साथ मंजू वर्मा के पति चंद्रशेखर वर्मा लगातार संपर्क में रहे हैं।

बिहार की समाज कल्याण मंत्री मंजू वर्मा ने अपने मंत्री पद से इस्तीफा दे दिया। मंजू वर्मा ने सीएम नीतीश कुमार से मुलाकात के बाद उन्होंने इस्तीफा सौपा है। बताया जा रहा है कि मंजू वर्मा के पति चंद्रशेखर वर्मा का नाम मुजफ्फरपुर बालिका गृह मामले में आ रहा था। जिसके चलते विपक्ष लगातार मंजू वर्मा से इस्तीफे की मांग कर रहा था और नीतीश सरकार पर दबाव बना रहा था।

इस केस की जांच कर रही सीबीआई ने ये खुलाशा किया था कि 34 नाबालिग बच्चियों के यौन उत्पीडऩ के मुख्य आरोपी ब्रजेश ठाकुर के साथ मंजू वर्मा के पति चंद्रशेखर वर्मा लगातार संपर्क में रहे हैं।

इस्तीफा देने के बाद मंजू वर्मा के घर पर सन्नाटा पसर गया है। जदयू एमएलसी रामेश्वर महतो मंजू वर्मा के आवास पर पहुंचे। उन्होंने कहा कि सिर्फ़ मंजू वर्मा को टारगेट क्यों किया जा रहा, ब्रजेश ठाकुर के फोन रिकार्ड की सीडीआर सार्वजनिक हो ताकि वह जिससे बातचीत करता हो सभी के नाम सामने आए।

बिग बॉस’ के बाद बंदगी-पुनीश ने इस गाने में पार की सारी हदें, हॉटलुक में किया जबरदस्त रोमांस

बिग बॉस के घर में अकशर लड़ाई प्यार दोस्ती देखने को मिलता था और जैसे ही घर के बाहर लोग आते हैं सब कुछ खत्म हो जाता है पर बिग बॉस सीजन 11 में ये नहीं हुआ.

बिग बॉस सीजन 11 के कंटेस्टेंट बंदगी कालरा और पुनीष शर्मा को अक्सर घर के अंदर एक साथ देखा जाता था. अब यही जोड़ी घर से बाहर भी एक साथ नजर आ रही हैं.

ये दोनों एक नए वीडियो में भी रोमांस का तड़का लगाती दिख रही है. बंदगी और पुनीश, मीत ब्रदर्स के नए गाने ‘लव मी..’ में नजर आ रहे हैं. इस गाने को गाया है सिंगर खुशबू ग्रेवाल ने. गाने में पुनीश और बंदगी फिर से अपनी हॉट केमिस्‍ट्री दिखाते नजर आ रहे हैं.

हालांकि इस नए गाने में पुनीश और बंदगी के रोमांस के अलावा और कुछ भी नहीं है. यानी इस गाने में इन दोनों की एक्टिंग या डांसिग स्किल की ज्‍यादा झलक देखने को नहीं मिलती है. फिर भी यह दोनों एक-दूसरे के साथ काफी अच्‍छे लग रहे हैं.

आपको याद दिला दें कि इससे पहले ‘बिग बॉस’ के सीजन 11 की हिना खान, प्रियांक शर्मा और बेनाफ्शा सोनावाला भी घर से निकलने के बाद वीडियो सॉन्‍ग में नजर आ चुके हैं. आप भी देखें पुनीश और बंदगी का यह रोमांटिक गाना.

इस गाने के रिलीज से पहले एक इंटरव्‍यू में पुनीश ने मीत ब्रदर्स के बारे में कहा था,

‘मीत ब्रदर्स, बॉलीवुड के सबसे कूल ब्रदर्स हैं. वह इस बॉलीवुड में परिवार से दूर रहने वालों के लिए एक परिवार की तरह हैं. वह शानदार गायक हैं और उतने ही शानदार इंसान भी.’

पुनीत दिल्‍ली के बिजनेसमैन हैं और उनका और बंदगी का रिश्‍ता इस रिएलिटी शो के दौरान ही बना था.

94 वर्ष की उम्र में करुणानिधि का निधन, जाने रोचक बातें उनके बारे में

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तमिलनाडु के पूर्व मुख्यमंत्री और डीएमके अध्यक्ष एम करूणानिधि अब इस दुनिया में नहीं रहें। लम्बे समय से उनकी तबियत ठीक नहीं थी. उन्हें ब्लड प्रेशर की समस्या के चलते 28 जुलाई को चेन्नई के कावेरी अस्पताल में दाखिल करवाया गया था। जिसके बाद से उनके स्वास्थ्य में लगातार गिरावट आ रही थी। आज 7 अगस्त 2018 को चेन्नई के कावेरी अस्पताल में अंतिम सांस ली.

आपको बता दे की उनकी उम्र 94 वर्ष था. हज़ारो की संख्या में कावेरी अस्पताल के बहार उनके समर्थक प्रार्थना कर रहे थे कि वह जल्द ही सेहतमंद हो जाएं, लेकिन बहुत ही दुःखद खबर आयी. कावेरी अस्पताल के डॉक्टरों ने बताया है कि उनका स्वास्थ बीती रात से ज्यादा खराब हो चुकी थी।

टॉप 5 सबसे लंबे समय तक सत्तारूढ़ मुख्यमंत्री

आपको बता दे की एम करूणानिधि एक सफल और लोकप्रिय नेता थे. वो 18 वर्ष, 293 दिनों तक तमिलनडु के CM की कुर्षी पर रहें। उनका नाम भारत के टॉप 5 सबसे लंबे समय तक सत्तारूढ़ मुख्यमंत्री में था. करुणानिधि 5 बार तमिलनाडु के मुख्यमंत्री रहे। जिसमें साल 1969, 1971, 1989, 1996 और 2006 शामिल है.

कई किताबे और सिनमा का पटकथा लिखते थे.

राजनेता होने के साथ-साथ करुणानिधि कई किताबें उपन्यास और नाटक भी लिख चुके थे। यही नहीं वो मूवी के लिए स्क्रीन राइटिंग और स्क्रिप्ट राइटिंग भी करते थे. सिनेमा से उनका काफी लगाव था. इसी के चलते उनके समर्थक प्यार से उन्हें कलाइनार यानि की कला का माहिर कहते थे। आपको बता दें कि करुणानिधि ने अपने जीवन के दौरान तीन शादियां की थी और उनके चार बेटे हैं।

14 वर्ष की आयु में पॉलिटिक्स ज्वाइन की 

करुणानिधि ने 14 साल की उम्र में राजनीति में प्रवेश किया, जो कि न्यायमूर्ति पार्टी के अलगिरिसवामी द्वारा भाषण से प्रेरित थे, और हिंदी विरोधी आंदोलनों में भाग लिया। उन्होंने अपने इलाके के स्थानीय युवाओं के लिए एक संगठन की स्थापना की। उन्होंने मानवार नेसन नामक एक हस्तलिखित समाचार पत्र को अपने सदस्यों के लिए प्रसारित किया। बाद में उन्होंने तमिलनाडु तमिल मनवर मंडराम नामक एक छात्र संगठन की स्थापना की, जो द्रविड़ आंदोलन का पहला छात्र विंग था। करुणानिधि ने स्वयं और छात्र समुदाय को अन्य सदस्यों के साथ सामाजिक कार्य में शामिल किया। यहां उन्होंने अपने सदस्यों के लिए एक समाचार पत्र शुरू किया, जो द्रमुक पार्टी के आधिकारिक अख़बार मुरासोली में बढ़ी।

गौरतलब है कि करुणानिधि के साथ ही देश की राजनीति का एक के इतिहास का एक पन्ना भी समाप्त हो गया। देश और अपने इलाके के विकास के लिए करुणानिधि का दिया गया योगदान हमेशा याद रखा जाएगा।